हाथरस की बेटी का चिता ठंडी हुई नहीं.. लो खबर अब आ गई बलरामपुर की नई! घर से निकली थी 'वो' मचलते हुए चाल में कुछ अंदाज़ा था नहीं भेड़िया हैं उसके राह में. ओ लड़की! रूक ज़रा, कहाँ चली इस पहर क्या तुझे मालूम नहीं शैतान हुए हैं प्रबल ? पहले चौंकी, घबराई... चली तेज़ी से राह में भेड़िया भी जल रहे थे कामुकता के आग में कलाई में हरकत हुई, फिर खींचा किसी ने जोर से पलभर में महसूस की कसाव है हर ओर से विनती की, 'वो' हाथ जोड़ी फिर चीख़ी और चिल्लाई... मुझसे क्या गलती हुई है, छोड़ दो मुझे भाई! इंसान थें या जानवर कुछ कहते बनता नहीं करूण चित्कार सुनकर भी शंकर की नेत्र खुली नहीं... हर आस टूटते देखकर वो अब थी ठंडी पड़ गई कहना बड़ा मुश्किल है ज़िंदा थी या फिर मर गई!! ~ आलोक रंजन