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Showing posts from August, 2023

दिरख़ा: अल्फाज़ और आंसू

 कभी कभी चाहते हुए भी जब कुछ चीजें कह पाना हो जाए मुश्किल... तब अल्फाज़ चमकने लगते हैं आंखों में बनकर आंसू!!                        - आलोक रंजन ' राठौड़ '

दिरखा: नींद और तेरा ख़ाब

 मेरे साथ कल रात को तेरे हाथों में हाथ डाले चल रहे थे कई ख़ाब नींद में... पहले नींद टूटी, फिर ख़ाब टूटा, वो हाथ छूटा अंततः तेरा साथ भी छूट गया!!                                      - आलोक रंजन 'राठौड़'

दिरखा: बड़ी मुश्किल होती है

 बड़ी मुश्किल होती है... हर किसी के नज़रों से लुक-छिपकर तुम्हें यूं ही तकते रहना! तुमको इसका इल्म है या नहीं, पता नहीं मगर हां, कभी उस एक नज़र में झांकना तुम पाओगे खुद को डूबते और फिर घुलते हुए. कई नज़रों के सामने उस एक नज़र में यूं ही खुद को डूबते हुए देखना भी सच में, बड़ी मुश्किल होती है!!                                      - आलोक रंजन 'राठौड़'

दिरख़ा: एहसास

 पसर जाता है अक्सर बिस्तर पर मेरे... कमबख्त, ये तेरा एहसास चैन से मुझे सोने क्यूं नहीं देता!!                                    - आलोक रंजन 'राठौड़'

आज़ादी: तेरा ख़्याल

 मुझे कब आज़ादी मिलेगी तेरे उन ख्यालों से...? कमल सी आंखें, गुलाब सा होंठ और तेरा वो चांद सा मुखड़ा....ये भी तो किसी कैदखाने से कम नहीं!!                        - आलोक रंजन 'राठौड़'