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दिरख़ा: तुम्हारी तस्वीर

  न जाने कहां से हर बार उकेर आती है तुम्हारी तस्वीर मैं तुम्हारी बात नहीं करता, तुम्हें याद नहीं करता, कोई वैसा ज़िक्र नहीं छेड़ता फिर भी, अनायास ही न जाने कहां से उकेर आती है तुम्हारी तस्वीर! कभी खिलखिलाती हुई, कभी मुस्कुराती हुई, कभी मुझे आखें दिखाती हुई तब हल्की सी मुस्कान तैरता हुआ पाता हूं अपने चेहरे पर जब अक्सर ही मेरे सामने उकेर आती है तुम्हारी तस्वीर तुम ही कहो, भला कैसे तुम्हें भूल जाऊं? अब तो हर वक़्त ही मेरे साथ चलती-फिरती रहती है तुम्हारी तस्वीर!!                                                  - आलोक रंजन 'राठौड़'
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दिरख़ा: अल्फाज़ और आंसू

 कभी कभी चाहते हुए भी जब कुछ चीजें कह पाना हो जाए मुश्किल... तब अल्फाज़ चमकने लगते हैं आंखों में बनकर आंसू!!                        - आलोक रंजन ' राठौड़ '

दिरखा: नींद और तेरा ख़ाब

 मेरे साथ कल रात को तेरे हाथों में हाथ डाले चल रहे थे कई ख़ाब नींद में... पहले नींद टूटी, फिर ख़ाब टूटा, वो हाथ छूटा अंततः तेरा साथ भी छूट गया!!                                      - आलोक रंजन 'राठौड़'

दिरखा: बड़ी मुश्किल होती है

 बड़ी मुश्किल होती है... हर किसी के नज़रों से लुक-छिपकर तुम्हें यूं ही तकते रहना! तुमको इसका इल्म है या नहीं, पता नहीं मगर हां, कभी उस एक नज़र में झांकना तुम पाओगे खुद को डूबते और फिर घुलते हुए. कई नज़रों के सामने उस एक नज़र में यूं ही खुद को डूबते हुए देखना भी सच में, बड़ी मुश्किल होती है!!                                      - आलोक रंजन 'राठौड़'

दिरख़ा: एहसास

 पसर जाता है अक्सर बिस्तर पर मेरे... कमबख्त, ये तेरा एहसास चैन से मुझे सोने क्यूं नहीं देता!!                                    - आलोक रंजन 'राठौड़'

आज़ादी: तेरा ख़्याल

 मुझे कब आज़ादी मिलेगी तेरे उन ख्यालों से...? कमल सी आंखें, गुलाब सा होंठ और तेरा वो चांद सा मुखड़ा....ये भी तो किसी कैदखाने से कम नहीं!!                        - आलोक रंजन 'राठौड़' 

मेरी डायरी में आज....

 आज मैं एक काॅपी लेकर बैठा हूँ जो दैनिक जागरण वाराणसी में इंटर्नशिप करने के दौरान का है. उस काॅपी की शुरू से एक एक पन्ने को पलट रहा हूँ और बड़े आहिस्ते से उसपर लिखे एक एक शब्दों को निहार रहा हूँ. और कुछ सोच रहा हूँ.....नहीं, शायद अपने अंदर कुछ ढूंढ रहा हूँ. हाँ....ढूंढ ही तो रहा हूँ उसे जो एक पत्रकार है, अब अधमरा सा है. एक अधमरा-सा पत्रकार अपने अंदर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है अभी. मैं खूब उसे झकझोर रहा हूँ....जगा रहा हूँ... चिल्ला रहा हूँ. मेरे अंदर की तड़प... वो चीख़ केवल मुझे ही सुनाई देती है. वो मेरी चीखें मेरे आसपास लोगों को, यहाँ तक की जिसने मुझे पालन पोषण कर इतना बड़ा किया है... मेरे में हुये हर बदलाव के गवाह रहे हैं... मेरे हर सावन को देखते आये हैं' को भी सुनाई नहीं देती है.  ये मेरे आसपास के मेरे अपने लोग मुझे देखते हैं और मैं मुस्कुरा देता हूँ. बात करते हैं तो बात कर लेता हूँ. कुछ पूछते हैं तो बता देता हूँ.  कुछ जिम्मेदारी सौंपते हैं तो निभा देता हूँ. 'और क्या हो रहा है?' ... ये सवाल आता है तो या तो झूठ बोल देता हूँ या अनसुना कर देता हूँ या फिर जवाब में ...