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दिरख़ा: तुम्हारी तस्वीर

 

न जाने कहां से हर बार उकेर आती है तुम्हारी तस्वीर
मैं तुम्हारी बात नहीं करता, तुम्हें याद नहीं करता, कोई वैसा ज़िक्र नहीं छेड़ता
फिर भी, अनायास ही न जाने कहां से उकेर आती है तुम्हारी तस्वीर!
कभी खिलखिलाती हुई, कभी मुस्कुराती हुई, कभी मुझे आखें दिखाती हुई
तब हल्की सी मुस्कान तैरता हुआ पाता हूं अपने चेहरे पर
जब अक्सर ही मेरे सामने उकेर आती है तुम्हारी तस्वीर
तुम ही कहो, भला कैसे तुम्हें भूल जाऊं?
अब तो हर वक़्त ही मेरे साथ चलती-फिरती रहती है तुम्हारी तस्वीर!!                

                                 - आलोक रंजन 'राठौड़'

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