Skip to main content

दिरख़ा: तुम्हारी तस्वीर

 

न जाने कहां से हर बार उकेर आती है तुम्हारी तस्वीर
मैं तुम्हारी बात नहीं करता, तुम्हें याद नहीं करता, कोई वैसा ज़िक्र नहीं छेड़ता
फिर भी, अनायास ही न जाने कहां से उकेर आती है तुम्हारी तस्वीर!
कभी खिलखिलाती हुई, कभी मुस्कुराती हुई, कभी मुझे आखें दिखाती हुई
तब हल्की सी मुस्कान तैरता हुआ पाता हूं अपने चेहरे पर
जब अक्सर ही मेरे सामने उकेर आती है तुम्हारी तस्वीर
तुम ही कहो, भला कैसे तुम्हें भूल जाऊं?
अब तो हर वक़्त ही मेरे साथ चलती-फिरती रहती है तुम्हारी तस्वीर!!                

                                 - आलोक रंजन 'राठौड़'

Comments

Popular posts from this blog

दिरखा : हाथरस से बलरामपुर

 हाथरस की बेटी का चिता ठंडी हुई नहीं..  लो खबर अब आ गई बलरामपुर की नई!  घर से निकली थी 'वो' मचलते हुए चाल में कुछ अंदाज़ा था नहीं भेड़िया हैं उसके राह में. ओ लड़की! रूक ज़रा, कहाँ चली इस पहर क्या तुझे मालूम नहीं शैतान हुए हैं प्रबल ?  पहले चौंकी, घबराई... चली तेज़ी से राह में भेड़िया भी जल रहे थे कामुकता के आग में कलाई में हरकत हुई, फिर खींचा किसी ने जोर से पलभर में महसूस की कसाव है हर ओर से विनती की, 'वो' हाथ जोड़ी फिर चीख़ी और चिल्लाई...  मुझसे क्या गलती हुई है, छोड़ दो मुझे भाई!  इंसान थें या जानवर कुछ कहते बनता नहीं करूण चित्कार सुनकर भी शंकर की नेत्र खुली नहीं...  हर आस टूटते देखकर वो अब थी ठंडी पड़ गई कहना बड़ा मुश्किल है ज़िंदा थी या फिर मर गई!!                  ~ आलोक रंजन

अपने चेहरे आईनों में जब देखोगे डर जाओगे

तुम अपने अक़ीदों के नेज़े  हर दिल में उतारे जाते हो  हम लोग मोहब्बत वाले हैं  तुम ख़ंजर क्यूँ लहराते हो  इस शहर में नग़्मे बहने दो  बस्ती में हमें भी रहने दो  हम पालनहार हैं फूलों के  हम ख़ुश्बू के रखवाले हैं  तुम किस का लहू पीने आए  हम प्यार सिखाने वाले हैं इस शहर में फिर क्या देखोगे  जब हर्फ़ यहाँ मर जाएगा  जब तेग़ पे लय कट जाएगी  जब शेर सफ़र कर जाएगा  जब क़त्ल हुआ सुर साज़ों का  जब काल पड़ा आवाज़ों का  जब शहर खंडर बन जाएगा  फिर किस पर संग उठाओगे  अपने चेहरे आईनों में  जब देखोगे डर जाओगे                              ✍ अहमद फ़राज़

दिरख़ा: तस्वीर

 उसने मुझे लिफाफे में जागीर भेंजी है...  हाँ, मुस्कुराती हुई अपनी एक तस्वीर भेंजी है!!                                                ~ आलोक रंजन