कभी-कभी शाम होते ही हृदय उद्वेलित हो जाता है। मन अशांत, बेचैन और निराश हो जाता है। इसका कोई सटीक कारण नहीं होता। बस हो जाता है तो हो जाता है। न किसी काम में मन लगता है न कोई बात अच्छी लगती है। ये घनघोर उदासी शायद पनपती है धीरे-धीरे कहीं भीतर, बेरोजगारी, लाचारी और मुफलिसी से सिंचित होती है और आधी रात तक बनकर खड़ी हो जाती है एक विशालकाय एवं भयानक वृक्ष की डरावनी छाया की तरह। क्या कर रहे हो इतने सालों से, क्यों नहीं हो रहा है सेलेक्शन, क्या सब तुम्हारी तरह बेरोजगारी में जी रहे हैं, कुछ तो शर्म करो अपनी उम्र का, अरे तुम लोग इलाहाबाद में बस ऐश काट रहे हो, नौकरी पाने के लिए दिनरात मेहनत करना पड़ता है। ऐसी तमाम बातें हैं जो एकाएक याद आने लगती हैं। आदमी अपनी किताबें पलटना शुरू करता है। समय सारणी बनती है। पचास चीजें छोड़ने की , अपनाने की कसमें खायी जाती हैं। मन फिर भी शांत नहीं होता, नींद फिर भी मयस्सर नहीं होती। गाँव देहात की पढ़ाई का ऐसा स्वरूप है कि आदमी या तो सरकारी नौकरी कर सकता है या फिर मजदूरी। वहाँ न संगीत की शिक्षा दी जाती है, न खेल के लिए प्रोत्साहन और न ही वाद विवाद या फिर लेखन प्रत...