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Showing posts from April, 2020

अपने चेहरे आईनों में जब देखोगे डर जाओगे

तुम अपने अक़ीदों के नेज़े  हर दिल में उतारे जाते हो  हम लोग मोहब्बत वाले हैं  तुम ख़ंजर क्यूँ लहराते हो  इस शहर में नग़्मे बहने दो  बस्ती में हमें भी रहने दो  हम पालनहार हैं फूलों के  हम ख़ुश्बू के रखवाले हैं  तुम किस का लहू पीने आए  हम प्यार सिखाने वाले हैं इस शहर में फिर क्या देखोगे  जब हर्फ़ यहाँ मर जाएगा  जब तेग़ पे लय कट जाएगी  जब शेर सफ़र कर जाएगा  जब क़त्ल हुआ सुर साज़ों का  जब काल पड़ा आवाज़ों का  जब शहर खंडर बन जाएगा  फिर किस पर संग उठाओगे  अपने चेहरे आईनों में  जब देखोगे डर जाओगे                              ✍ अहमद फ़राज़

अपने आप मर जाओगे.. ✍ अभिषेक सिंह

कभी-कभी शाम होते ही हृदय उद्वेलित हो जाता है। मन अशांत, बेचैन और निराश हो जाता है। इसका कोई सटीक कारण नहीं होता। बस हो जाता है तो हो जाता है। न किसी काम में मन लगता है न कोई बात अच्छी लगती है। ये घनघोर उदासी शायद पनपती है धीरे-धीरे कहीं भीतर, बेरोजगारी, लाचारी और मुफलिसी से सिंचित होती है और आधी रात तक बनकर खड़ी हो जाती है एक विशालकाय एवं भयानक वृक्ष की डरावनी छाया की तरह। क्या कर रहे हो इतने सालों से, क्यों नहीं हो रहा है सेलेक्शन, क्या सब तुम्हारी तरह बेरोजगारी में जी रहे हैं, कुछ तो शर्म करो अपनी उम्र का, अरे तुम लोग इलाहाबाद में बस ऐश काट रहे हो, नौकरी पाने के लिए दिनरात मेहनत करना पड़ता है। ऐसी तमाम बातें हैं जो एकाएक याद आने लगती हैं। आदमी अपनी किताबें पलटना शुरू करता है। समय सारणी बनती है। पचास चीजें छोड़ने की , अपनाने की कसमें खायी जाती हैं। मन फिर भी शांत नहीं होता, नींद फिर भी मयस्सर नहीं होती। गाँव देहात की पढ़ाई का ऐसा स्वरूप है कि आदमी या तो सरकारी नौकरी कर सकता है या फिर मजदूरी। वहाँ न संगीत की शिक्षा दी जाती है, न खेल के लिए प्रोत्साहन और न ही वाद विवाद या फिर लेखन प्रत...

दिरख़ा: कितना शांत है मेरा शहर...

"कितना शांत है मेरा शहर...  कोई आवाज़ नहीं सिवाय हवा के झरोखों के.  ऐसा लगता है मानो यहाँ के बाशिंदे कहीं और चले गये   हैं... और छोड़ गये हैं मुझे यहाँ की विरानापन को महसूस करने के लिए!  या फिर सो गये हैं सभी एक लम्बे समय के लिए अपने- अपने सिलवटों में... और कोई जग रहा है तो सिर्फ इस शहर की जगमगाती ये बिजली वाली बत्तियां और मैं. कहीं कोई कोलाहल नहीं है, कोई बातचीत नहीं हैं.. फुसफुसाहट नहीं है, सिर्फ सन्नाटा है. और अगर कोई कहता भी है तो वो ये हवा है,  जिसकी आवाज़ मेरे कानों में कुछ सुनाती हुई आगे निकल जाती है… और मैं खड़ा अकिंचित सोचता रहता हूँ कि आख़िर क्या कह गयी होगी ये हवा?"                                                               ...
हर रोज़ ज़ेहन में कौंधती हैं हज़ारों कहानियाँ... मगर हां, विस्मृत भी बहुत होती हैं!