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अपने आप मर जाओगे.. ✍ अभिषेक सिंह

कभी-कभी शाम होते ही हृदय उद्वेलित हो जाता है। मन अशांत, बेचैन और निराश हो जाता है। इसका कोई सटीक कारण नहीं होता। बस हो जाता है तो हो जाता है। न किसी काम में मन लगता है न कोई बात अच्छी लगती है। ये घनघोर उदासी शायद पनपती है धीरे-धीरे कहीं भीतर, बेरोजगारी, लाचारी और मुफलिसी से सिंचित होती है और आधी रात तक बनकर खड़ी हो जाती है एक विशालकाय एवं भयानक वृक्ष की डरावनी छाया की तरह। क्या कर रहे हो इतने सालों से, क्यों नहीं हो रहा है सेलेक्शन, क्या सब तुम्हारी तरह बेरोजगारी में जी रहे हैं, कुछ तो शर्म करो अपनी उम्र का, अरे तुम लोग इलाहाबाद में बस ऐश काट रहे हो, नौकरी पाने के लिए दिनरात मेहनत करना पड़ता है। ऐसी तमाम बातें हैं जो एकाएक याद आने लगती हैं। आदमी अपनी किताबें पलटना शुरू करता है। समय सारणी बनती है। पचास चीजें छोड़ने की , अपनाने की कसमें खायी जाती हैं। मन फिर भी शांत नहीं होता, नींद फिर भी मयस्सर नहीं होती। गाँव देहात की पढ़ाई का ऐसा स्वरूप है कि आदमी या तो सरकारी नौकरी कर सकता है या फिर मजदूरी। वहाँ न संगीत की शिक्षा दी जाती है, न खेल के लिए प्रोत्साहन और न ही वाद विवाद या फिर लेखन प्रतियोगिता। बस किताबें रटते रहो दिन रात। पढ़ने के अलावा जितने भी काम हैं सब आवारों के लिए हैं, अच्छा लड़का बस पढ़ना जानता है और कुछ नहीं। ऐसी जगह से निकल कर आदमी जब बड़े शहरों की ओर जाता है तो देखता है कि लोग रोजगार के तमाम तरीके ढूँढ रहे हैं, बिना सरकारी नौकरी के भी अच्छे से कमा खा रहे हैं। वो चीजें उसको अच्छी लगती हैं क्योंकि पढ़ाई और नौकरी का बोझ तो उसपे थोपा गया है। वो अपनी रूचि का काम कभी किया ही नहीं या यों कहें कि उसे करने ही नहीं दिया गया। वो घर में चोरी चोरी प्रेमचंद को पढ़ता था, हिंदी कविताएँ रटता था, प्रेम के गीत लिखता था, गुरु दत्त की फिल्में देखता था, रफी के गाने सुनता था। लेकिन वो किताबें फाड़ दी गईं, वो कविताएँ मिटा दी गई, वो गीत कुचल दिये गये, वो रेडियो चकनाचूर हो गया। वो कुछ नहीं सीख पाया, कुछ नहीं जान पाया सिवाय किताबें रटने के। अंग्रेजी में हाथ तंग है, अफसर से नीचे बनना नहीं है। घर परिवार नात रिश्तेदार सब उससे उम्मीदें लगाये बैठे हैं। अब वापस जाने के सारे रास्ते बंद हैं। अब उसे यही करना है, सिर्फ यही करना है। वैसे ही स्टेटस लगाने हैं, वही फिल्में देखनीं हैं, वैसी ही मोटिवेशनल किताबें पढ़नीं हैं। नीली बत्ती के रौब के बारे में जानना है। कमजोर और गरीब लड़के जो कलेक्टर बन गए हैं उनकी कहानियाँ सुननी है। एक कमरे में बंद रहना है, दाल भात चोखा खाना है। रविवार को सभी घर वालों और रिश्तेदारों को अपना रिपोर्ट कार्ड दिखाना है। अपनी तैयारी का सबूत देना है। पहले एक दो साल तो बंदा झेल लेता है फिर दबाव बढ़ता जाता है, कम्पटीशन बढ़ता जाता है, मनोबल टूटता जाता है और अवसाद घेरने लगता है। कहीं कुछ और हाथ आजमाने की कोशिश करता है तो गरीबी रास्ता रोक कर खड़ा हो जाती है। माँ बाप के उदास चेहरे पर मुस्कान लानी है, बहन के हाथ पीले कराने हैं, भाई (जो तुम्हारी पढ़ाई के नाते अपनी पढ़ाई छोड़कर पैसे कमाने में जुटा है ताकि तुमको बराबर अपने हिस्से का खर्च भेजा जा सके) की जिम्मेदारी है। हजार परेशानियां तो इधर हैं ही। ऊपर से सोशलमीडिया से लेकर अखबारों तक भरे पेट वालों के चोचले। जाति, धर्म, सम्प्रदाय और मारने काटने वाली बातें। दिनरात इनका बोझ सहना पड़ता है। जो दोस्त यार कभी बनें भी थे वो भी इन्हीं गंदे नालों में भस्म हो गए। कोई मुस्लिम हो गया, कोई दलित हो गया, कोई मूलनिवासी, कोई सामाजिक  लोकतंत्र के लिए तुमसे दूरी बना लिया। अब बेचारा इस गिल्ट में भी मरे कि सब हमारे पुरखों ने गुड़ गोबर किया है, सबके लिए हम ही जिम्मेदार हैं। ऊपर से प्रेम का भूत भी सवार है, लड़की तुमसे प्यार भी करती है, तुमसे शादी भी करना चाहती है लेकिन घर वालों से कैसे बताये, न तुम्हारी हैसियत बड़ी है न ही तुम नौकरी करते है। बस कुल मिला जुलाकर एक जाति ही में तुम उसके बराबर हो। जल्दी से कुछ करके नौकरी ले लो, नहीं तो मैं बहुत दिनों तक अपने घर वालों को नहीं रोक पाऊँगी। ये एक और प्रेशर, मतलब लड़की हाथ से गई तो ज़िन्दगी भर खुद को कोसते रह जाओगे कि मेरी ही गलती थी, टाइम से नौकरी मिल जाती तो उसे रोक सकता था। अब इन सबके को झेलते हुए बंदा शाम से अकारण उदास है और आधी रात को पागल सा टहल रहा है। न कोई रास्ता, न कोई ठौर, न ठिकाना, न बहाना। इधर सरकार है तो उसे न ही पारदर्शिता में रूचि है और न ही रोजगार पैदा करने में। लिखने पढ़ने में ठीक हो, हिम्मत करके पत्रकारिता वगैरह की पढ़ाई भी कर लिए तो न ही उस क्षेत्र में कोई पहचान है और न ही अच्छे संस्थान की डिग्री (फीस महंगी होने के कारण), और बंदा उस कटेगरी में आता है जिसके लिए सरकारी दस्तावेजों में कोई कटेगरी नहीं रखी जाती माने अनारक्षित(भारत में सभी के ऊपर किये गए अत्याचारों का इकलौता जिम्मेवार भी),तुम्हें नौकरी क्या इंटर्नशिप भी नहीं मिलेगी,चाहे किसी के सामने रोओ,गिड़गिड़ाओ या फिर माथा फोड़ लो। आजकल तो और भी बुरी स्थिति, कोरोना का कहर, लॉकडाउन, आर्थिक मंदी और रोजगार पर खतरा मंडराता हुआ। इधर धड़ल्ले से सबके अंदर से एक आर्टिस्ट पैदा हो रहा है। कोई प्रेम गीत, कोई किताब तो कोई अच्छे पकवान बनाकर उसकी तस्वीर और रेसेपी भी शेयर कर रहा है। इसमें किसी की गलती नहीं है, सबके लिए वो बंदा इकलौता जिम्मेदार है, आदमी अपनी किस्मत खुद लिखता है, जहाँ चाह है वहाँ राह है, हम ठान लें तो कोई भी काम असंभव नहीं है, सब हमारे हाथ में है। ये सब कहके शेर दहाड़ेंगे, तुम्हें कायर कहेंगे, बुजदिल कहेंगे, कामचोर कहेंगे। तुम्हें सबको सुनना, सबकुछ झेलना है, न आह भरनी है, न उफ़्फ़ करना है क्योंकि दुनिया बहुत मेच्योर हो गई है। तुम्हें लड़ना है लेकिन हारना नहीं चाहे मर भले ही जाओ। ये लड़ाई तुमने नहीं चुनी, तुमपे थोपी गई है लेकिन तुम अंग्रेजों के गुलाम भारत हो, उनकी लड़ाई तुम्हारी लड़ाई है, उनको बचाने में तुम्हें अपने बच्चों को मारना ही होगा और कोई चारा नहीं है और कोई रास्ता नहीं। तुम्हारे हाथ काटकर तुम्हें तलवार थमाई गई है, बहादुरी से चलाओ। तुम्हारे पैर काटकर दौड़ने के लिए बोला गया है, सबसे आगे निकल जाओ। तुम्हारी शाम कभी रंगीन नहीं होगी, तुम्हारी रात कभी सुहानी नहीं होगी। तुम ऐसे ही सबकुछ खोकर घुटघुटकर एकदिन आधी रात को घबरा के अपने आप मर जाओगे...!!
                       ✍ अभिषेक सिंह

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