"कितना शांत है मेरा शहर...
कोई आवाज़ नहीं सिवाय हवा के झरोखों के.
ऐसा लगता है मानो यहाँ के बाशिंदे कहीं और चले गये हैं... और छोड़ गये हैं मुझे यहाँ की विरानापन को महसूस करने के लिए!
या फिर सो गये हैं सभी एक लम्बे समय के लिए अपने- अपने सिलवटों में... और कोई जग रहा है तो सिर्फ इस शहर की जगमगाती ये बिजली वाली बत्तियां और मैं.
कहीं कोई कोलाहल नहीं है, कोई बातचीत नहीं हैं.. फुसफुसाहट नहीं है, सिर्फ सन्नाटा है.
और अगर कोई कहता भी है तो वो ये हवा है, जिसकी आवाज़ मेरे कानों में कुछ सुनाती हुई आगे निकल जाती है… और मैं खड़ा अकिंचित सोचता रहता हूँ कि आख़िर क्या कह गयी होगी ये हवा?"
✍ आलोक रंजन

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