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मेरी डायरी में आज....

 आज मैं एक काॅपी लेकर बैठा हूँ जो दैनिक जागरण वाराणसी में इंटर्नशिप करने के दौरान का है. उस काॅपी की शुरू से एक एक पन्ने को पलट रहा हूँ और बड़े आहिस्ते से उसपर लिखे एक एक शब्दों को निहार रहा हूँ. और कुछ सोच रहा हूँ.....नहीं, शायद अपने अंदर कुछ ढूंढ रहा हूँ. हाँ....ढूंढ ही तो रहा हूँ उसे जो एक पत्रकार है, अब अधमरा सा है. एक अधमरा-सा पत्रकार अपने अंदर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है अभी. मैं खूब उसे झकझोर रहा हूँ....जगा रहा हूँ... चिल्ला रहा हूँ. मेरे अंदर की तड़प... वो चीख़ केवल मुझे ही सुनाई देती है. वो मेरी चीखें मेरे आसपास लोगों को, यहाँ तक की जिसने मुझे पालन पोषण कर इतना बड़ा किया है... मेरे में हुये हर बदलाव के गवाह रहे हैं... मेरे हर सावन को देखते आये हैं' को भी सुनाई नहीं देती है.  ये मेरे आसपास के मेरे अपने लोग मुझे देखते हैं और मैं मुस्कुरा देता हूँ. बात करते हैं तो बात कर लेता हूँ. कुछ पूछते हैं तो बता देता हूँ.  कुछ जिम्मेदारी सौंपते हैं तो निभा देता हूँ. 'और क्या हो रहा है?' ... ये सवाल आता है तो या तो झूठ बोल देता हूँ या अनसुना कर देता हूँ या फिर जवाब में 'एक- दो जगह प्रयास किया हूँ, उम्मीद है' कहकर आगे बढ़ जाता हूँ. मगर अपने अंदर चल रहे द्वंद्व से मैं स्वयं ही दो-चार हाथ कर रहा हूँ.... इस द्वंद्व को मैं किसी से साझा नहीं करता. 

मैंने इन्हीं कश्मकश में आज उस काॅपी की प्रत्येक पन्ने पर अपने ही द्वारा लिखे उस एक एक शब्दों को देख रहा हूँ. उम्मीद है कि ऐसा करने से या तो मेरे अंदर की वो चीख़ें शांत हो जाए या फिर वो अधमरा पत्रकार ठीक हो जाए!! 

                ~ कोरोना महामारी के इस दौर में अपने अंदर अस्तित्व की लड़ाई लड़ता एक पत्रकार....आलोक रंजन.

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