हाथरस की बेटी का चिता ठंडी हुई नहीं.. लो खबर अब आ गई बलरामपुर की नई! घर से निकली थी 'वो' मचलते हुए चाल में कुछ अंदाज़ा था नहीं भेड़िया हैं उसके राह में. ओ लड़की! रूक ज़रा, कहाँ चली इस पहर क्या तुझे मालूम नहीं शैतान हुए हैं प्रबल ? पहले चौंकी, घबराई... चली तेज़ी से राह में भेड़िया भी जल रहे थे कामुकता के आग में कलाई में हरकत हुई, फिर खींचा किसी ने जोर से पलभर में महसूस की कसाव है हर ओर से विनती की, 'वो' हाथ जोड़ी फिर चीख़ी और चिल्लाई... मुझसे क्या गलती हुई है, छोड़ दो मुझे भाई! इंसान थें या जानवर कुछ कहते बनता नहीं करूण चित्कार सुनकर भी शंकर की नेत्र खुली नहीं... हर आस टूटते देखकर वो अब थी ठंडी पड़ गई कहना बड़ा मुश्किल है ज़िंदा थी या फिर मर गई!! ~ आलोक रंजन
तुम अपने अक़ीदों के नेज़े हर दिल में उतारे जाते हो हम लोग मोहब्बत वाले हैं तुम ख़ंजर क्यूँ लहराते हो इस शहर में नग़्मे बहने दो बस्ती में हमें भी रहने दो हम पालनहार हैं फूलों के हम ख़ुश्बू के रखवाले हैं तुम किस का लहू पीने आए हम प्यार सिखाने वाले हैं इस शहर में फिर क्या देखोगे जब हर्फ़ यहाँ मर जाएगा जब तेग़ पे लय कट जाएगी जब शेर सफ़र कर जाएगा जब क़त्ल हुआ सुर साज़ों का जब काल पड़ा आवाज़ों का जब शहर खंडर बन जाएगा फिर किस पर संग उठाओगे अपने चेहरे आईनों में जब देखोगे डर जाओगे ✍ अहमद फ़राज़
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