Skip to main content

दिरखा : हाथरस से बलरामपुर

 हाथरस की बेटी का चिता ठंडी हुई नहीं.. 

लो खबर अब आ गई बलरामपुर की नई! 

घर से निकली थी 'वो' मचलते हुए चाल में

कुछ अंदाज़ा था नहीं भेड़िया हैं उसके राह में.

ओ लड़की! रूक ज़रा, कहाँ चली इस पहर

क्या तुझे मालूम नहीं शैतान हुए हैं प्रबल ? 

पहले चौंकी, घबराई... चली तेज़ी से राह में

भेड़िया भी जल रहे थे कामुकता के आग में

कलाई में हरकत हुई, फिर खींचा किसी ने जोर से

पलभर में महसूस की कसाव है हर ओर से

विनती की, 'वो' हाथ जोड़ी फिर चीख़ी और चिल्लाई... 

मुझसे क्या गलती हुई है, छोड़ दो मुझे भाई! 

इंसान थें या जानवर कुछ कहते बनता नहीं

करूण चित्कार सुनकर भी शंकर की नेत्र खुली नहीं... 

हर आस टूटते देखकर वो अब थी ठंडी पड़ गई

कहना बड़ा मुश्किल है ज़िंदा थी या फिर मर गई!! 

                ~ आलोक रंजन

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

अपने चेहरे आईनों में जब देखोगे डर जाओगे

तुम अपने अक़ीदों के नेज़े  हर दिल में उतारे जाते हो  हम लोग मोहब्बत वाले हैं  तुम ख़ंजर क्यूँ लहराते हो  इस शहर में नग़्मे बहने दो  बस्ती में हमें भी रहने दो  हम पालनहार हैं फूलों के  हम ख़ुश्बू के रखवाले हैं  तुम किस का लहू पीने आए  हम प्यार सिखाने वाले हैं इस शहर में फिर क्या देखोगे  जब हर्फ़ यहाँ मर जाएगा  जब तेग़ पे लय कट जाएगी  जब शेर सफ़र कर जाएगा  जब क़त्ल हुआ सुर साज़ों का  जब काल पड़ा आवाज़ों का  जब शहर खंडर बन जाएगा  फिर किस पर संग उठाओगे  अपने चेहरे आईनों में  जब देखोगे डर जाओगे                              ✍ अहमद फ़राज़

दिरख़ा: तस्वीर

 उसने मुझे लिफाफे में जागीर भेंजी है...  हाँ, मुस्कुराती हुई अपनी एक तस्वीर भेंजी है!!                                                ~ आलोक रंजन

दिरख़ा: तुम्हारी तस्वीर

  न जाने कहां से हर बार उकेर आती है तुम्हारी तस्वीर मैं तुम्हारी बात नहीं करता, तुम्हें याद नहीं करता, कोई वैसा ज़िक्र नहीं छेड़ता फिर भी, अनायास ही न जाने कहां से उकेर आती है तुम्हारी तस्वीर! कभी खिलखिलाती हुई, कभी मुस्कुराती हुई, कभी मुझे आखें दिखाती हुई तब हल्की सी मुस्कान तैरता हुआ पाता हूं अपने चेहरे पर जब अक्सर ही मेरे सामने उकेर आती है तुम्हारी तस्वीर तुम ही कहो, भला कैसे तुम्हें भूल जाऊं? अब तो हर वक़्त ही मेरे साथ चलती-फिरती रहती है तुम्हारी तस्वीर!!                                                  - आलोक रंजन 'राठौड़'