Skip to main content

मौन की रेखायें : मानव कौल


आदतन...

अपना भविष्य मैं अपने हाथों की रेखाओं में टटोलता हूँ।

'कहीं कुछ छुपा हुआ है'- एक ऐसा चमत्कार,

एक छोटे बादल जैसा हमेशा मेरे साथ चलता है।

तेज़ धूप में इस बादल से हमें कोई सहायता नहीं मिलती है।

वो बस हथेली में एक तिल की तरह, पड़ा रहता है।

अब तिल का होना शुभ है,

और इससे लाभ होगा..

इसलिए इस छोटे से बादल को संभालकर रखता हूँ।

फिर इच्छा होती है, कि वहाँ चला जाऊँ...

जहाँ बारिश पैदा होती है,

बादल बट रहे होते हैं।

पर शायद देर हो चुकी है,

अब मेरी आस्था का अंगूठा इतना कड़क हो चुका है,

कि वो किसी के विश्वास में झुकता ही नहीं है।

फिर मैं उन रेखाओं के बारे में भी सोचता हूँ...

जो बीच में ही कहीं ग़ायब हो गई थी।

'ये एक दिन मेरी नियति जीयेगा'- की आशा में...

जो बहुत समय तक मेरी हथेली में पड़ी रहीं।

क्या थी उनकी नियती?

कौन सी दुनिया इंतज़ार कर रही है, इन दरवाज़ों के उस तरफ़,

जिन्हें मैं कभी खोल नहीं पाया...।

तभी मैंने एक अजीब सी चीज़ देखी,

मैंने देखा मेरे माथे पर कुछ रेखाएँ बढ गयी हैं....अचानक, 

अब ये रेखाएँ क्या हैं...क्या इनकी भी कोई नियति है, अपने दरवाज़े हैं?

नहीं...इनका कुछ भी नहीं है,

बहुत बाद में पता चला इनका कुछ भी नहीं है...।


ये 'मौन' की रेखाएँ हैं

मौन उन रेखाओं का....जो मेरे हाथों में उभरी थीं,

पर मैं उनके दरवाज़े कभी खोल ही नहीं पाया।

सच!....मैंने देखा है- जब भी कोई रेखा मेरे हाथों से ग़ायब हुई है,

मैंने उसका मौन, अपने माथे पर महसूस किया है।

पता नहीं, पर मुझे लगता है.... 

यही मौन हैं, जो हमें बूढा बनाते हैं।

जिस दिन माथे पर जगह ख़त्म हो जाएगी.... 

ये मौन चेहरे पर उतर आएगा,

और हम बूढे हो जाएंगें...!! 

                               ~ मानव कौल

Comments

Popular posts from this blog

दिरखा : हाथरस से बलरामपुर

 हाथरस की बेटी का चिता ठंडी हुई नहीं..  लो खबर अब आ गई बलरामपुर की नई!  घर से निकली थी 'वो' मचलते हुए चाल में कुछ अंदाज़ा था नहीं भेड़िया हैं उसके राह में. ओ लड़की! रूक ज़रा, कहाँ चली इस पहर क्या तुझे मालूम नहीं शैतान हुए हैं प्रबल ?  पहले चौंकी, घबराई... चली तेज़ी से राह में भेड़िया भी जल रहे थे कामुकता के आग में कलाई में हरकत हुई, फिर खींचा किसी ने जोर से पलभर में महसूस की कसाव है हर ओर से विनती की, 'वो' हाथ जोड़ी फिर चीख़ी और चिल्लाई...  मुझसे क्या गलती हुई है, छोड़ दो मुझे भाई!  इंसान थें या जानवर कुछ कहते बनता नहीं करूण चित्कार सुनकर भी शंकर की नेत्र खुली नहीं...  हर आस टूटते देखकर वो अब थी ठंडी पड़ गई कहना बड़ा मुश्किल है ज़िंदा थी या फिर मर गई!!                  ~ आलोक रंजन

अपने चेहरे आईनों में जब देखोगे डर जाओगे

तुम अपने अक़ीदों के नेज़े  हर दिल में उतारे जाते हो  हम लोग मोहब्बत वाले हैं  तुम ख़ंजर क्यूँ लहराते हो  इस शहर में नग़्मे बहने दो  बस्ती में हमें भी रहने दो  हम पालनहार हैं फूलों के  हम ख़ुश्बू के रखवाले हैं  तुम किस का लहू पीने आए  हम प्यार सिखाने वाले हैं इस शहर में फिर क्या देखोगे  जब हर्फ़ यहाँ मर जाएगा  जब तेग़ पे लय कट जाएगी  जब शेर सफ़र कर जाएगा  जब क़त्ल हुआ सुर साज़ों का  जब काल पड़ा आवाज़ों का  जब शहर खंडर बन जाएगा  फिर किस पर संग उठाओगे  अपने चेहरे आईनों में  जब देखोगे डर जाओगे                              ✍ अहमद फ़राज़

दिरख़ा: तस्वीर

 उसने मुझे लिफाफे में जागीर भेंजी है...  हाँ, मुस्कुराती हुई अपनी एक तस्वीर भेंजी है!!                                                ~ आलोक रंजन